वैदिक गणित

रचयता : शंकराचार्य भारती कृष्ण तीर्थ जी महाराज। इन्होने २० वर्ष की आयु तक १२ से अधिक विषयों में मास्टर की डिग्री प्राप्त की थी.

शंकराचार्य श्री निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज कहते हैं की भारती कृष्ण जी महाराज ने गणित के सूत्र वेद से लिए हैं। जाने यहाँ - https://youtu.be/OzwtI9epNGM

इस कक्षा की तैयारी प्रो. नरेंद्र पूरी , जो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रूड़की में सिविल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर हैं, द्वारा दिए गए यूट्यूब के लेक्चर को देख के की गयी है।

नरेंद्र पूरी जी नें स्वयं भी अंग्रेजी में वैदिक गणित पर पुस्तक लिखी है जो की भारती कृष्ण तीर्थ जी महाराज के पुस्तक का संक्षेपिकरन है. भारती कृष्ण तीर्थ जी महाराज जी की पुस्तक का हिन्दी रॊपान्तरन् यह है .

  1. वेद का अर्थ है ज्ञान।

  2. आधुनिक गणित की आधारशिला वैदिक गणित पर ही राखी गयी है। परन्तु आधुनिक गणित अधूरा है अतः पंगु है।

  3. भास्कराचार्य द्वारा रचित ग्रन्थ में अंकगणित पढ़ाते हुए वो कहते हैं की १० के अलावा आधार कुछ भी हो सकता है। दस के आधार वाली संख्याओं को दसमलव पद्धिति के अंक कहते हैं। दस्मलव का ही विकृत स्वरुप decimal शब्द है।

  4. नासा के वैज्ञानिक डॉ. रिक ब्रिग्ग्स ने एक रिसर्च पेपर में, जो की American Journal of artificial intelligence में प्रकाशित किया गया था , कहा है की हमें भारतीय ऋषियों द्वारा दिए द्विअंकीय प्रणाली को नहीं भूलना चाहिए जिससे की आधुनिक computer की आधारशिला राखी गयी। पाश्चात्य तरीकों को पढ़ के यह स्वाभाविक लगता है की उनका ज्ञान विज्ञान भारतीय ऋषियों से चुराया हुआ मात्र है।

  5. वैदिक गणित में गिनिती १ से प्रारम्भ होती है। संख्या ९ को ब्रम्ह अंक भी कहते हैं।

  6. "विनकुलम", जो वैदिक गणित का एक अभिन्न घटक है आधुनिक गणित पाठन की शैली में प्रायः प्रयोग में नहीं आता। द्विअंकीय पद्धित के कंप्यूटर की शिक्षा देने के क्रम में यह विनकुलम उपयोगी उपाय है।

  7. विनकुलम संख्या एक ऐसी संख्या है जिसमें धनात्मक एवं ऋणात्मक दोनों के अंक होंगे।

  8. ऋणात्मक अंक को दर्शाने के लिए "रेखांक" का प्रयोग करते हैं।

$$ \bar{१} = -१ $$

एक और उदाहरण देखें

$$ ९ = १० - १$$$$ १० - १ = १\bar{१} $$

इस तरीके से , जो की विनकुलम कहलाता है हम ९ के स्थान पर १ और $\bar{१}$ से काम चला सकते हैं।

और एक उदाहरण :

$३७८९$ को हमें विनकुलम में परिवर्तित करना है

इसमें " निखिलं नावतः चरममम् दसतः " सूत्र का उपयोग होगा एवं " एकाधिकेन पूर्वेण " .

जो संख्या ५ से अधिक है उनका रेखांक बना लेंगे। इस प्रकार से

पहला कदम : $$(३ + १ ) \bar{(९ - ७ )} \bar{(९ - ८ )} \bar{(१० - ९ )}$$

दूसरा कदम : $$४\bar{२}\bar{१}\bar{१}$$

ध्यान से देखने पर यह पता चलता है की इस विनकुलम संख्या से हम आरंभिक संख्या प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार :

$$ ४००० - २११ = ३७८९ $$

प्रयोग में लाने वाली विधि इस प्रकार है :

हम पुनः "निखलम् नवतः चरमम् दसतः" क प्रयोग करेङ्गे एवम् "एक न्यूनेन पूर्वेन " क प्रयोग करेङ्गे.

$$(४-१)(९-२)(९-१)(१०-१) = ३७८९ $$

एक और उदाहरण :

गृह कार्य

  1. $\bar{४}३५\bar{२}\bar{७}२$ को हमें या तो हम पूर्णतया रेखांक में बदल देंगे या हम पहले अंक को रेखांक रहित बना देंगे।
  2. रेखांक क्या है ?
  3. विनकुलम क्या है ?
  4. पूरक क्या है ?
  5. एकाधिकेन पूर्वेण क्या है ?
  6. निखलम् नवतः चरमम् दशतः क्या है ?

द्विअंकीय प्रणाली की सिद्धि इन तीन सूत्रों से होती है :

  1. एकाधिकें पूर्वेण।

  2. एक न्यूनेन पूर्वेण।

  3. शिष्यते सेष संज्ञः।

निश्चलानन्द् जी कहते हैं :

संनिकट निर्विशेष से एकाधिक गुण वाले संनिकत सविशेष की उत्पत्ति होति है.

"उपादेय की अपेक्षा उपादान सन्निकट निर्विशेष होना चाहिए" - श्री निश्चलानन्द सरस्वती जी

पृथ्वी में "शब्द", "स्पर्श", "रूप", "रस", "गंध" ; ये पांच गुण विध्य्यमान हैं। यदि छठा गन पृथ्वी में होता तो ५ की जगह ६ ज्ञान इन्द्रियाँ हमें प्राप्त होतीं। 

[प्रश्न : चमगादड़, या डॉलफिन-मछली में क्या वो छठी इन्द्रिय नहीं जिसे अंग्रेजी में "सोनार", जो किंचित विशिष्ठ तरह की ध्वंनि तरंगें ही हैं जो टकरा कर फिर वापस आने पर सामने पायी स्थूल वस्तु से दूरी का भान होता है। यदि यह सत्य है की ये ध्वनि तरंगें ही हैं और इनकी जानकारी समझने वाली इन्द्रिय भी "स्पर्श" की श्रेणी में आएँगी, तो कोई प्रश्न नहीं। परन्तु यदि यह एक छठा गुण है तो कृपा कर समाधान करें।]




गणना कि दृष्टि से प्रथम अंक १ है। स्थान की दृष्टि से प्रथम अंक ० है।


गणित का प्रयोजन :

  1. प्रज्ञा शक्ति को विशद करना।

  2. व्यवहार को सुव्यवस्थित करना।

  3. मोक्ष मार्ग को प्रशस्त करना।


निश्चलानंद सरस्वती जी ने ८ ग्रन्थ द्विअंकीय प्रणाली पर लिखी है। ये ग्रन्थ आधुनिक गणित में त्रुटि को सुधारने के लिए लिखे गए हैं।

वैदिक गणित जो श्री भारती कृष्ण तीर्थ जी महाराज ने लिखी है , उसका एक विचित्र ढंग से व्याख्या लिखने का प्रयोजन निश्चलानंद जी महाराज का है। https://youtu.be/R8Eh4VfOHXQ


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